संधि कितने प्रकार की होती है – Sandhi Kitne Prakar Ki Hoti Hai

संधि कितने प्रकार की होती है – जब निकटवर्ती वर्णों (शब्द) के परस्पर मेल से जो विकार (परिवर्तन) होता है वह संधि कहलाता है।

संधि का अर्थ जोड़ या मेल होता है जो सम् + धि शब्द से मिलकर संधि शब्द का निर्माण करता है जिसके तीन प्रकार होते है।

जब दो शब्द आपस में मिलकर एक शब्द का निर्माण करता है तब उसे संधि-विच्छेद के नाम से जाना जाता है। उदाहरण के रूप में विद्या +आलय = विद्यालय प्रमुख रूप से शामिल है।

यहाँ आप देखेंगे, दो वर्णों को जब आपस में मिला दिया जाता है तब एक शब्द या वर्ण बन जाता है।

शब्दो का संधि करते समय उसमें मौजूद एक से अधिक अक्षरों में परिवर्तन होता है जिससे कभी-कभी दोनों अक्षरों के स्थान पर किसी तीसरा शब्द का निर्माण हो जाता है जिसे संधि पद्धति द्वारा शब्द रचना कहा जाता है।

 जैसे – महोदय = महा + उदय, महा + ऋषि= महर्षि, सुर + इन्द्र = सुरेन्द्र शामिल है। 

दुनिया की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली हमारी हिन्दी भाषा में संधि के द्वारा पूरे शब्दों या वर्णों को लिखने की परम्परा नही है, लेकिन भारत के पौराणिक भाषा संस्कृत में संधि के बिना शब्द का निर्माण और उसे बोल पाना थोड़ा कठिन हो जाता है।

संस्कृत व्याकरण की परम्परा बहुत पुरानी है जिसे जानने, समझने और पढ़ने के लिए व्याकरण को पढ़ना और समझना बहुत जरूरी हो जाता है।

हिन्दी और संस्कृत भाषा में शब्द रचना के दौरान यह संधियाँ ही काम करती है। जिसे विद्यार्थी जीवन में जानना आवश्यक हो जाता है।

अक्सर स्टूडेंट इंटरनेट पर व्याकरण (Grammar) सीखने के क्रम में संधि किसे कहते है – संधि के कितने प्रकार होते है  के बारें में सर्च करते रहते है

जिससे उनकी मदद के लिए हम ने इस ब्लॉग लेख में आपको Sandhi Kitne Prakar Ki Hoti Hai के बारें में सम्पूर्ण जानकारी  प्रदान करने की कोशिश की है

इसीलिए इस लेख को शुरवात से अंत तक जरूर पढ़े जहा आप को संधि संबंधित पूरी जानकारी प्राप्त होगी

 

 Sandhi Kitne Prakar Ki Hoti Hai
Sandhi Kitne Prakar Ki Hoti Hai

विषय

व्याकरण संधि किसे कहते है और उसके कितने प्रकार होती हैं उनके नाम क्या है?

Sandhi Kise Kahte Hai – संधि (व्याकरण) संस्कृत भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ जोड़ (जोड़ना) और मेल (मिलाना) होता है।

जब पास-पास स्थित पदों के समीप विघमान दो या उससे अधिक वर्णों के मिलन से होने वालें परिवर्तन को संधि कहते है।

हम कह सकते है कि जब दो वर्ण मिलते है तब पहले वर्ण की अंतिम ध्वनि और दूसरे वर्ण का पहली ध्वनि आपस में मिलकर जो परिवर्तन लाता है और एक दूसरे वर्ण या शब्द का निर्माण करता है उसे व्याकरण संधि के नाम से जाना जाता है।

इस प्रक्रिया में कभी-कभी पहली और कभी-कभी दूसरी या फिर कभी दोनों ध्वनियों में परिवर्तन होता है जिसका तीनों स्थितियों का उदाहरण नीचे देखकर इसके परिभाषा को समझा जा सकता है।

 

संधि के तीनों स्थितियों के उदाहरण 

  • प्रथम ध्वनि में विघटन, किंतु दूसरी ध्वनि में नहीं,
  • यथा + अवसर = यथावसर
  • मही + इंद्र = महींद्र

(ख)    दूतीय ध्वनि में विघटन, किंतु पहली ध्वनि में नहीं,

  • गिरि + ईश = गिरीश
  • सत् + जन = सज्जन

(ग) प्रथम एवं दूतीय दोनों ध्वनियों में विघटन,

  • उत् + श्वास = उच्छ्वास
  • देव + इंद्र = देवेंद्र

 

संधि विच्छेद – Sandhi Viched Kya Hai

जब दो या उससे अधिक वर्णों से मिलकर बना शब्द को संधि कहते है,

लेकिन जब शब्दों के मिलावट से बने वर्णों को समझने के लिए जब इसके सभी पदों को अलग-अलग करने की प्रक्रिया को संधि-विच्छेद कहते है। जिसका उदाहरण नीचे दिया गया है: –

  • निर्धन = निः + धन
  • उच्चारण = उत् + चारण
  • अभिषेक = अभि + सेक
  • दिग्गज = दिक् + गज
  • संकल्प = सम् + कल्प

 

संधि कितने प्रकार की होती है – Sandhi Kitane Prakar Ki hoti hai

वर्णों के आधार पर संधि के तीन भेद होते है –

  1. स्वर संधि
  2. व्यंजन संधि
  3. विसर्ग संधि

Sandhi Kitane Prakar Ki hoti hai


स्वर संधि किसे कहते है – Swar Sandhi Kise Kahte Hai

What is Vowels in hindi – जब दो स्वर वर्णों की अत्यंत समीपता के कारण यथाप्राप्त वर्ण विकार को स्वर संधि कहते है या फिर कहा जा सकता है कि जब स्वर के साथ किसी स्वर वर्ण का आपस में मेल होता है जिसके बाद होने वालें परिवर्तन को स्वर संधि कहते है।

हिन्दी भाषा में स्वर वर्ण में 11 अक्षर होते है जिसकी शुरुआत अ से लेकर अ: तक होता है। जब दो स्वर मिलने से तीसरा स्वर का निर्माण होता है उसे स्वर संधि कहा जाता है।

इसके अलावा दो शब्दो के आपस में मिलने से जो विकार उत्पन्न होता है, वह स्वर संधि कहलाता है।

स्वर संधि के उदाहरण:

  • विद्या + अर्थी = विद्यार्थी,
  • सूर्य + उदय = सूर्योदय,
  • मुनि + इंद्र = मुनीन्द्र,
  • महा + ईश = महेश

 

स्वर संधि के कितने भेद होती है – Types of Vowels in hindi

स्वर संधि के वर्णों के आधार पर पूरे छ: प्रकारें या भेद होते है जिसका नाम नीचे देखा जा सकता है –

  1. दीर्घ स्वर संधि
  2. गुण स्वर संधि
  3. वृद्धि स्वर संधि
  4. यण स्वर संधि
  5. अयादी स्वर संधि
  6. पूर्वरूप स्वर संधि

 

दीर्घ स्वर संधि किसे कहते है – Dirgh Sandhi Kise Kahte Hai

जब दो स्वर शब्द मिलकर दीर्घ यानि बड़ा बन जाता है तब उसे दीर्घ संधि कहा जाता है अर्थात जब अ, आ के साथ अ, आ वर्ण हो जाता है तब ‘आ’ वर्ण का निर्माण होता है,

जब इ, ई के साथ इ, ई हो तब ‘ई’ बनता है और जब उ, ऊ के साथ उ, ऊ वर्ण मिलता है तब ‘ऊ’ बनता है।

हम कह सकते है कि जब दो सुजातिय स्वर आस-पास आते है तब जो स्वर बनता है उसे सुजातीय दीर्घ स्वर संधि कहते है जिसे ह्रस्व संधि भी बोला जाता है

दीर्घ स्वर संधि के उदाहरण : 

  • पुस्तक + आलय = पुस्तकालय,
  • विद्या + अर्थी = विद्यार्थी,
  • रवि + इंद्र = रविन्द्र,
  • गिरी +ईश = गिरीश,
  • धर्म + अर्थ = धर्मार्थ

गुण स्वर संधि किसे कहते है – Gun Sandhi Kise Kahte Hai

जब अ, आ के आगे इ, ई हो तो ए ; उ, ऊ हो तो ओ तथा ऋ हो तो अर् हो जाता है। इसे गुण-संधि कहते हैं अर्थात दो भिन्न-भिन्न स्थानों से उच्चारित होने वालें स्वरों के बीच गुण संधि होता है।

दीर्घ स्वर संधि के उदाहरण: –

  • महेन्द्र = महा + इन्द्र (आ + इ = ए)
  • राजेश = राजा + ईश (आ + ई = ए)
  • अ/आ + इ/ई = ए
  • अ, आ + उ, ऊ = ओ
  • अ, आ + ऋ = अर्

वृद्धि स्वर संधि किसे कहते है – Vridhi Swar Sandhi Kise Kahte Hai

यदि ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘ए’ या ‘ऐ’ हो आएं तो दोनों के स्थान पर ‘ऐ’ एकादेश हो जाता है।

इसी तरह ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘ओ’ या ‘औ’ आएं तो दोनों के स्थान पर ‘औ’ एकदेश हो जाता है। तब उसे वृद्धि स्वर संधि कहा जाता है।

यदि दीर्घ ‘अ’ के आगे ‘ओ’ अथवा ‘औ’ आए तो उन दोनों के जगह पर ‘औ’ वर्ण हो जाता है, जिसे वृद्धि स्वर संधि कहते है।

वृद्धि स्वर संधि के उदाहरण: –

  • मत+एकता = मतैकता
  • एक +एक =एकै क
  • धन + एषणा = धनैषणा
  • सदा + एव = सदैव
  • महा + ओज = महौज

ण स्वर संधि किसे कहते है –Yan Sandhi Kise Kahate Hai

जब कुछ स्वर आपस में संधि करने के क्रम में किसी दूसरे स्वर में बदल जाने के बजाएँ व्यंजन वर्ण के शब्द य, व, र इत्यादि में परिवर्तित हो जाते है, तब उस संधि को यण संधि कहा जाता है।

यहाँ इक् (इ, उ, लू, ऋ) के जगह पर यण (य, र, ल, व) अक्षर वर्ण होने की क्रिया यान संधि कहलाती है।

जब इ, ई, उ, ऊ, ऋ तथा लू के बाद कोई असमान स्वर आएं, तो ‘इ’ को य, ऊ को व, ऋ को ‘र’ तथा ‘लू’ को ‘ल’ आदेश हो जाता है जो यण संधि का ही उदाहरण और परिभाषा है।

यण संध के तीन कार के संध यु पद होते है। (1) य से पूर्व आधा व्यंजन होना चाहए।

(2)व से पूर्व आधा व्यंजन होना चाहिए और (3)शब्द में त्र होना चाहए। यण स्वर संधि में यह भी एक शर्त दी गयी है कि य और त्र में स्वर होना चाहिए और उसी से बने शुद्ध व सार्थक स्वर को + के बाद लिखने की क्रिया को यण संधि कहते है।

यण स्वर संधि के उदाहरण : 

  • इत + आद = इाद
  • पर + आवरण = पयावरण
  • अनु + अय = अवय
  • सु + आगत = वागत
  • अभी + आगत = अयागत
  • अति + आवश्यक = अ + त् + इ + आ + व + श् + य + क
  • अ + त् + या + व + श् + य + क
  • अ + त्या + व + श् + य + क = अत्यावश्यक
  • व्यर्थ = वि + अर्थ ( इ + अ = य)

 

अयादी स्वर संधि किसे कहते है – Ayaadi Sandhi Kise Kahte Hai

जब ए, ऐ, ओ तथा औ के बाद कोई स्वर आएं तो ‘ए’ को अय, ‘ओ’ को अव तथा ‘औ’ को आव आदेश हो जाता है, लेकिन अगर और कोई विच्छेद न निकलता है तब + के बाद वालें भाग को वैसा ही लिखने की क्रिया को अयादी स्वर संधि कहते है।

अयादी स्वर संधि के उदाहरण : 

  • ए + अ = अय् + अ ; ने + अन = नयन
  • ऐ + अ = आय् + अ ; गै + अक = गायक
  • ओ + अ = अव् + अ ; पो + अन = पवन
  • औ + अ = आव् + अ ; पौ + अक = पावक
  • औ + इ = आव् + इ ; नौ + इक = नाविक

 

पूर्वरूप स्वर संधि किसे कहते है – Purvroop Sandhi Kise Kahte Hai

पूर्वरूप संधि को अयादी संधि का अपवाद भी कहा जाता है। जब किसी शब्द के पद के अंत में स्थित ए, ओ के बाद यदि किसी हस्व ‘अ’ आयें तो ‘ए+अ’ दोनों के स्थान पर पूर्वरूप संधि ‘ए’ एकादेश तथा ‘ओ+अ’ के स्थान पर ‘ओ’ एकादेश आने की संभवना को पूर्वरूप स्वर संधि कहा जाता है।

अर्थात ए-ओ के पश्चात आने वाला ‘अ’ अपना रूप ए-ओ में ही विलीन कर लेता हो, तब उस विलीन को ‘अ’ का रूप लिपि में अवग्रह चिन्ह (ऽ) द्वारा अंकित किया जाता है। जैसे – हरे + अत्र में हरयत्र होना चाहिए,

परंतु ‘अ’ ‘ए’ में समा गया है और जिसके बाद इसका रूप हरेऽत्र बना। यहाँ उच्चारण के समय हरेत्र ही कहा जाता है। आपको बताते चलें अवग्रह का कोई खास उच्चारण नही होता है।

पूर्वरूप स्वर संधि के उदाहरण: 

  • ते + अपि = तेऽपि
  • हरे + अव = हरेऽव
  • वृक्षे + अपि = वृक्षेऽपि
  • जले + अस्ति = जलेऽस्ति
  • गोपालो + अहम = गोपालोऽहम
  • विष्णो + अव = विष्णोऽव

 

व्यंजन संधि किसे  कहते है – Vyanjan Sandhi Kise Kahte Hai

What is consonant in hindi – जब व्यंजन के पश्चात स्वर या दो व्यंजन वर्णों के परस्पर व्यवधानरहित सामीप्य की स्थिति में जो व्यंजन या हल वर्ण का परिवर्तन हो जाता हौ, उसे व्यंजन संधि कहा जाता है।

अर्थात व्यंजन वर्ण के बाद यदि किसी स्वर या व्यंजन के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, वह व्यंजन संधि कहलाता है।


Sandhi Kitane Prakar Ki hoti hai


हिन्दी भाषा में स्वर वर्ण में 41 अक्षर होते है जिसकी शुरुआत क से लेकर ज्ञ तक होता है।

किसी व्यंजन वर्ग के पहले वर्ण क, च, ट, त, प के बाद किसी वर्ग का तीसरा एवं चौथा अक्षर या वर्ण या कोई स्वर आ जाएँ, तो उस वर्ग के उस प्रथम के जगह पर उसी का तीसरा अक्षर हो जाता है।

व्यंजन संधि के उदाहरण : 

  • दिक् + अम्बर = दिगम्बर
  • अभी + सेक = अभिषेक
  • वाक् + मय = वाङमय
  • अप् + मयः = अम्मय
  • शरत् + चंद्र = शरच्च्तद्र

 

व्यंजन संधि कितने प्रकार की होती है – Types of Consonant in hindi

व्यंजन संधि के प्रकार संस्कृत में मुख्य रूप से 8 प्रकारे होती है –

  1. श्‍चुत्‍व (स्‍तो: श्‍चुना श्‍चु:) – ‘स’ या ‘त’ वर्ग (त, थ, द् , ध, न् ) क् ‘श’ या ‘च’ वर्ग (च, छ्, ज, झ् , ञ) के साथ (आगे या पीछे) योग होने पर ‘स’ का ‘श’ तथा ‘त’ वर्ग का ‘च’ वर्ग में परिवर्तन हो जाता है।
  2. ष्‍टुत्‍व (ष्‍टुना ष्‍टु :) – यदि ‘स’ या ‘त’ वर्ग का ‘ष’ या ‘ट’ वर्ग (ट, ठ, ड, ढ तथा ण) के साथ (आगे या पीछे) योग हो तो ‘स’ का ‘ष’ और ‘त’ वर्ग के स्‍थान पर ‘ट’ वर्ग हो जाता है।
  3. जश्‍त्‍व (झलां जशोऽन्‍ते)पद के अन्‍त में स्थित झल के स्‍थान पर जश् हो जाता है। झलों में वर्ग का प्रथम, द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ वर्ण तथा श, ष् ,स तथा ह् कुल 24 वर्ण आते हैं।
  4. चर्त्व (खरि च)यदि वर्गों (क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, तथा प वर्ग) के द्वितीय, तृतीय या चतुर्थ वर्ण के बाद वर्ग का प्रथम या द्वितीय वर्ण या श, ष् , स् आए तो पहले आने वाला वर्ण अपने ही वर्ग का प्रथम वर्ण हो जाता है।
  5. अनुस्‍वार (मोऽनुस्‍वार:) – • यदि किसी पद के अन्‍त में ‘म’ हो तथा उसके बाद कोई व्‍यञ्जन आए तो ‘म’ का अनुस्वार (॰ ) हो जाता है।
  6. परसवर्ण (अनुस्‍वारस्‍य ययि परसवर्ण:)अनुस्‍वार के बाद कोई भी वर्गीय व्‍यञ्जन आए तो अनुस्‍वार के स्‍थान पर आगे वाले वर्ण के वर्ग का पञ्चम वर्ण हो जाता है बताया गया नियम पदान्‍त में कभी नहीं भी लगाया जा सकता है।
  7. छत्‍व (शश्‍छोऽटि)यदि ‘श’ के पूर्व पदान्‍त में किसी वर्ग का प्रथम, द्वितीय, तृतीय अथवा चतुर्थ वर्ण हो या र, ल् , व अथवा ह् हो तो श के स्‍थान पर ‘छ्’ हो जाता है।
  8. लत्‍व (तोर्लि)यदि ‘त’ वर्ग के बाद ‘ल’ आए तो तवर्ग के वर्णों का ‘ल’ हो जाता है किन्‍तु ‘न’ के बाद ‘ल’ आने पर अननुासिक ‘लँ’ होता है। ‘लँ’ का अनुनासिक चिन्ह पूर्व वर्ण पर पड़ता है।

 

व्यंजन संधि के नियम क्या है – Vyajan Sandhi Ke Niyam aur Udahran

संस्कृत भाषा में संधि के इतने व्यापक नियम होते है कि सभी वाक्य संधि करके एक शब्द स्वरूप में लिखा जा सकता है जिसका विस्तृत उदाहरण – ततस्तमुपकारकमाचार्यमालोक्येश्वरभावनायाह है। अर्थात् – ततः तम् उपकारकम् आचार्यम् आलोक्य ईश्वर-भावनया आह।


Vyajan Sandhi Ke Niyam aur Udahran


व्यंजन संधि के जितना सारा प्रकारें है उतना ही सभी का नियम होती है वैसे तो मुख्य रूप से इसमें 8 नियम होते है जिसका उदाहरण सहित नीचे बताया गया है

नियम – 1

  • च् + अ = ज्: अच् + अंत = अजंत
  • ट् + आ = डा: षट्+आनन = षडानन
  • प् + ज = ब्ज: अप्+ज = अब्ज

नियम – 2

  • ट् + म् = ण् षट्+मास = षण्मास
  • त् + न् = न् उत्+नयन = उन्नयन
  • प् + म् = म् अप्+मय = अम्मय

नियम – 3

  • त् + ई = दी जगत्+ईश = जगदीश
  • त् + र = द्र तत् + रूप = तद्रूप
  • त् + ध = द्ध सत् + धर्म = सद्धर्म

नियम – 4

  • त् + ट = ट्ट तत्+टीका = तट्टीका
  • त् + ड = ड्ड उत्+डयन = उड्डयन
  • द् + ज = ज्ज विपद्+जाल = विपज्जाल

नियम – 5

  • त् + श = च्छ उत्+शिष्ट = उच्छिष्ट
  • त् + ह = द्ध उत्+हार = उद्धार
  • त् + ह = द्ध उत्+हार=उद्धार

नियम – 6

  • अ + छ = अच्छ स्व+छंद = स्वच्छंद
  • आ + छ = आच्छ आ+छादन = आच्छादन
  • उ + छ = उच्छ अनु+छेद = अनुच्छेद

नियम – 7

अवदत् + च = अवदच्च

षट् + मासाः = षण्मासाः


नियम – 8

सम्यक् + हतः = सम्यग्घतः / सम्यग् हतः

एतद् + हितम् = एतद्धितम् / एतद्हितम्

म् + म = म्म सम्+मान = सम्मान


विसर्ग संधि किसे कहते है – Visarg Sandhi Kise Kahte Hai

जैसे कि इसके नाम से ही पता चलता है, इस प्रकार की संधि करते समय विसर्ग के बाद व्यंजन या स्वर वर्ण जुड़ता है तब पहले शब्द के विसर्ग से दूसरे वर्ण का संयोग मिलन से बना शब्द का स्वर या व्यंजन वर्ण मिलकर नए शब्द का निर्माण करता है।

अर्थात विसर्ग (:) के बाद जब स्वर या व्यंजन आ जायें, जिसके पश्चात जो परिवर्तन होता है, उसे विसर्ग संधि कहते है।

विसर्ग संधि के उदाहरण 

  • मन: + अनुकू ल = मनोनुकूल
  • न:+अर = नरर
  • न: + पाप =नपाप
  • दु:+उपयोग = दुरुपयोग

 

विसर्ग संधि के कितने प्रकर या भेद होती है

Visarg Sandhi के मुख्य रूप से चार भेद होता है: –

  1. रुत्‍व ( : = र्)
  2. षत्‍
  3. विसर्ग का रुत्‍व-उत्‍व, गु ण तथा पू र्वरूप
  4. सत्‍व (विसर्जनीयस्‍य स:)

 

FAQ’s – Sandhi Kitne Prakar Ki Hoti Hai Hindi 

सवाल : समास कितने प्रकार के होते हैं

समास वह क्रिया है, जिसमें हिन्दी के कम से अक्म शब्दो को जोड़कर अधिक से अधिक अर्थ वालें शब्दो को प्रकट करने की क्रिया को समास कहते है जिसके छ: प्रकार के होते हैं-(1) तत्पुरुष (2) अव्ययीभाव (3) कर्मधारय (4) द्विगु (5) द्वन्द्व और (6) बहुव्रीहि समास।

सवाल : संज्ञा कितने प्रकार की होती है

किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थान, प्राणी, गुण, भाव आदि के नाम को संज्ञा कहते है जिसके तीन प्रकर होती है (1) व्यक्तिवाचक संज्ञा, (2) जातिवाचक संज्ञा, (3) भाववाचक संज्ञा

सवाल : संधि कितने प्रकार की होती है संस्कृत में

संस्कृत भाषा में भी संधि तीन प्रकारें के होती है (1) स्वर संधि, (2) व्यंजन संधि और (3) विसर्ग संधि

सवाल : संधि किसे कहते हैं उदाहरण सहित लिखिए

जब दो या डोसे अधिक वर्णों को परस्पर मेल एवं उनमे कोई परिवर्तन भी हो जाता है, तब उसे संधि कहा जाता है। दो वर्णो का मेल तो हो लेकिन उनमे कोई परिवर्तन न हो तो उसे संधि न कहकर संयोग कहा जाता है। जिसका उदाहरण – उद + योग = उदयोग, सम् + तोष = संतोष

सवाल : स्वर संधि किसे कहते हैं उदाहरण सहित बताइए

दो स्वरों के मेल से होने वाले विकार (परिवर्तन) को स्वर-संधि कहते हैं। जैसे – विद्या + आलय = विद्यालय।

 

Conclusion

इस ब्लॉग लेख में आपने संधि कितने प्रकार की होती है ? – Types of Vyakaran Sandhi in Hindi के बारें में जाना। आशा करते है आप स्वर, व्यंजन और विसर्ग संधि किसे कहते है की पूरी जानकारी जान चुके होंगे।

अगर आपका इससे संबन्धित किसी भी तरह का सवाल है तब नीचे कमेन्ट में पूछ सकते है जिसका जवाब जल्द से जल्द दिया जायेगा।

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