भारतीय संविधान की प्रस्तावना क्या है | Preamble to the Constitution of India in Hindi

भारतीय संविधान की प्रस्तावना : इस लोकतांत्रिक भारत का जो सबसे बड़ा दस्तावेज माना जाता है वह है इसका अभूतपूर्व संविधान और साथ ही साथ इस संविधान की  प्रस्तावना को संविधान की आत्मा मानी जाती हैं

जब भारतीय संविधान को बनाया जा रहा था तब संविधान निर्माताओं के समक्ष यह सबसे बड़ी चुनौती आई थी कि वह किस प्रकार से इस संपूर्ण संविधान के मूल्यों को मात्र कुछ वाक्यों में व्यक्त करके इस संपूर्ण भारत की सामान्य जनता तक पहुंचाएं

तो इसके लिए भारत के संविधान निर्माताओं द्वारा भारत के संविधान में प्रस्तावना को सम्मिलित किया गया जिसके द्वारा हम यह जान सकते हैं कि इस पूरे भारतीय संविधान कि वे कौन-कौन सी विशेषताएं हैं जो कि इसमें वर्णित है

तो आज के इस लेख में हम चर्चा करने वाले हैं भारतीय संविधान की प्रस्तावना के बारे में और साथ ही साथ इससे जुड़ी कुछ अन्य बातें जोकि आपके लिए महत्वपूर्ण सिद्ध होगी

 

Preamble to the Constitution of India 

 

भारतीय संविधान की प्रस्तावना | Preamble to the Constitution of India 

संविधान की प्रस्तावना जिसे कि भारत के संविधान की आत्मा और भारतीय संविधान  का हृदय भी कहा जाता है परंतु यह सभी उपाधियां देने के पीछे जो सबसे बड़ा कारण हैं वह है इस संविधान के प्रस्तावना की सरलता और इसका महत्त्व

इसके महत्व के बारे में बताया जाए तो इसे 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा संविधान सभा में रखा गया था और उस समय इसे संविधान की प्रस्तावना ना कह कर उद्देश्य प्रस्ताव कहा गया था अर्थात कि भारतीय संविधान के क्या क्या उद्देश्य होने चाहिए

यह उद्देश्य प्रस्ताव 22 जनवरी 1947 को पूर्ण बहुमत से संविधान सभा द्वारा पारित कर दिया गया अर्थात कि अब यह स्पष्ट हो चुका था कि भारतीय संविधान की आत्मा अर्थात प्रस्तावना भी भारत के संविधान में जुड़ने वाली हैं

उद्देश्य प्रस्ताव या उद्देशिका जिसे कि बाद में भारत के संविधान की प्रस्तावना के नाम से जाना गया उसमें मुख्यता 8 बिंदु वर्णित है जोकि निम्नलिखित हैं

  1. गणराज्य
  2. सप्रभुता
  3. सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय
  4. विचारों की अभिव्यक्ति
  5. उपासना और किसी भी धर्म पर विश्वास करने की आजादी
  6. रियासतों का विलय
  7. मानव जाति का कल्याण
  8. अन्य राष्ट्रों के साथ अच्छे व मित्रता पूर्ण संबंध

 

इन सभी बिंदुओं द्वारा यह स्पष्ट था कि आजादी के बाद भारत मुख्यता अपनी रणनीती किस ओर रखेगा और अपने स्वयं का शासन किस प्रकार से संचालित करेगा जो कि इस की प्रस्तावना में पहले से ही वर्णित थे

भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ भीमराव अंबेडकर द्वारा यह कथन कहा गया था कि

“हमें अपनी इस प्रस्तावना को इस प्रकार से बनाना है कि इसमें भारतीय संविधान की संपूर्ण झलक भारत की संपूर्ण जनता को दिखाई दे और यदि कोई संपूर्ण संविधान को नहीं पढ़ना चाहें तो इस प्रस्तावना को पढ़कर ही यह पता लगा ले कि वास्तविकता में भारतीय संविधान क्या कहना चाहता है” 


भारत के संविधान की प्रस्तावना का प्रारूप

भारतीय संविधान की प्रस्तावना के प्रारूप को पढ़ना भी बेहद जरूरी हो जाता है क्योंकि यह हमें संपूर्ण भारतीय संविधान की व्याख्या मात्र कुछ शब्दों में करके बताती हैं

हम, भारत के वासी  भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए

और व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए
दृढ़ संकल्पित होकर अपनी संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई॰ को इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं


भारतीय संविधान की प्रस्तावना क्या है


प्रस्तावना के कुछ महत्वपूर्ण शब्द और उनकी व्याख्या

हमारे द्वारा जब संविधान की प्रस्तावना को पढ़ा जाता है तो कई बार इसमें कुछ ऐसे शब्द आते हैं जिन्हें हम नहीं समझ पाते हैं या जिनकी सही ढंग से व्याख्या हम नहीं कर पाते हैं जैसे कि

1. अंगीकृत, अधिनियमित और आत्माअर्पित

इन सभी शब्दों में अंगीकृत का अर्थ होता है अपनाना अर्थात की हम सभी भारतवासी इस संविधान की प्रस्तावना को अपना रहे हैं

इन सभी शब्दों में अधिनियमित का अर्थ होता है लागू करना अर्थात कि हम सभी भारतवासी इस प्रस्तावना को संपूर्ण भारत में लागू करने के लिए तैयार है

इन सभी शब्दों में आत्मा अर्पित का अर्थ होता है आत्मा के अंदर बसाना अर्थात कि हम सभी भारतवासी इस संविधान की प्रस्तावना को अपने हृदय में हमेशा के लिए संभाल कर रखेंगे और इसे कभी नहीं भूलेंगे


2. सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय

यहां पर उन सभी न्याय के प्रकारों की चर्चा की गई है जो कि एक मानव को प्राप्त होने चाहिए या फिर कहा जाए तो एक भारतीय नागरिक को यह सभी न्याय मिलने चाहिए

अगर इनमें से एक भी न्याय से कोई भारतीय नागरिक वंचित रह रहा है तो इसका सीधा सा मतलब यह है कि उसकी स्वतंत्रता खतरे में हैं या फिर वह अपनी स्वतंत्रता का पूर्ण रूप से उपयोग नहीं कर पा रहा है

  • सामाजिक न्याय

सामाजिक न्याय का तात्पर्य होता है कि एक व्यक्ति को समाज में बिना किसी भेदभाव के समान रूप से समाज में आगे बढ़ने के अवसर प्रदान किए जाए और उसकी प्रगति में समाज अपना उचित योगदान प्रदान करेंगा

  • आर्थिक न्याय

आर्थिक न्याय का तात्पर्य होता है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन की आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने का अधिकार है और उसे कानूनी तरीके से आर्थिक न्याय प्राप्त करने का भी अधिकार हैं

  • राजनीतिक न्याय

राजनीतिक न्याय का तात्पर्य होता है कि प्रत्येक व्यक्ति को वोट देने का अधिकार मिले और भारत की संसद तक उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व पहुंचे और साथ ही साथ उस व्यक्ति की क्या आवश्यकताएं हैं उनको भी पूरा किया जाए


3. राष्ट्र की एकता और अखंडता

हर भारतीय नागरिक का यह दायित्व है कि वह इस अखंड भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखें और कोई भी कार्य या ऐसा विचार ना करें जिससे कि भारत की एकता और अखंडता को किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचे

इसे एक साधारण से उदाहरण द्वारा भी समझा जा सकता है कि यदि आपके द्वारा भारत के विरोध में कोई बात की जा रही हैं तो आप इससे भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचा रहे हैं भले ही आपके पास विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही क्यों ना हो


4. संविधान सभा

प्रस्तावना में संविधान सभा के बारे में भी बताया गया है जिसने भारत के संविधान की रचना की थी और उन्हीं संविधान निर्माताओं की बदौलत आज यह प्रस्तावना भी हमारे सामने दिखाई देती हैं

प्रस्तावना में संविधान सभा की चर्चा इसलिए की गई है क्योंकि इनके द्वारा 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान के प्रारूप को अपनाया गया था और इसी दिन प्रस्तावना को भी अपना लिया गया था

परंतु भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को संपूर्ण देश में लागू हुआ था


भारत के संविधान की प्रस्तावना का इतिहास

जब संविधान सभा की स्थापना हुई थी तो पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को उद्देश्य प्रस्ताव जिसे कि बाद में उद्देशिका का नाम भी दिया गया उससे संविधान सभा के समक्ष रखा था

22 जनवरी 1947 को या उद्देश्य प्रस्ताव संविधान सभा द्वारा स्वीकार कर लिया गया और इसे पारित कर दिया गया, इस उद्देश्य प्रस्ताव को हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में रखा गया था

इस उद्देश्य प्रस्ताव का उर्दू में अनुवाद मोहनलाल सक्सेना द्वारा किया गया था जो कि संविधान सभा के सदस्य भी थे

उद्देश्य प्रस्ताव में विभिन्न प्रकार के 8 बिन्दुओं की चर्चा की गई थी जिनको कि बाद में भारतीय संविधान की प्रस्तावना में थोड़े बहुत परिवर्तन के बाद शामिल कर लिया गया था

प्रस्तावना को भारतीय संविधान का आंतरिक भाग माना जाता है अर्थात कि इसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकता है

संविधान सभा द्वारा 17 अक्टूबर 1949 को प्रस्तावना को स्वीकार किया गया था जबकि भारतीय संविधान के प्रारूप को 26 नवंबर 1949 को स्वीकार किया गया था

संविधान सभा के सदस्य व भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा 17 अक्टूबर 1949 को यह कहा गया था कि “आज से प्रस्तावना भारतीय संविधान का एक भाग है”

तो कुछ इस प्रकार से भारतीय संविधान में वर्णित प्रस्तावना को भारतीय संविधान का एक अखंड भाग मानते हुए स्वीकार किया गया था


भारत के संविधान की प्रस्तावना में संशोधन

हालांकि जब भारत का संविधान लागू हुआ था तो प्रस्तावना में किसी भी प्रकार का संशोधन नहीं किया गया था परंतु इस प्रस्तावना में एक बार संशोधन किया गया था और उस संशोधन का नाम है 42 वा संविधान संशोधन अधिनियम 1976 था जो कि 3 जनवरी 1977 को पूरे भारत में लागू हुआ था

हालांकि इससे पहले बेरुबारी विवाद जो कि 1960 में सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था उसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह कह दिया गया था कि प्रस्तावना भारत के संविधान का भाग नहीं है

वही बात की जाए तो केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह भी कह दिया गया था कि इस प्रस्तावना में संविधानिक संशोधन किया जा सकता है और इसी के कुछ वर्षों बाद 42वां संविधान संशोधन भी आ गया था

42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के बाद जो कि भारत में 3 जनवरी 1977 को लागू हुआ था

भारती संविधान की प्रस्तावना में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया गया और न ही कभी इस में परिवर्तन करने की आवश्यकता महसूस हुई


भारत के संविधान की प्रस्तावना के बारे में कहे गए कुछ महत्वपूर्ण कथन

1. नानी पल्खीवाला

नानी पल्खीवाला द्वारा भारतीय संविधान की प्रस्तावना के बारे में कहा गया था कि यह हमारे भारतीय संविधान का परिचय पत्र है और अगर कोई बहुत ही कम शब्दों में भारतीय संविधान को समझना चाहता है तो उसे इस प्रस्तावना को पढ़ लेना चाहिए


2. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी द्वारा प्रस्तावना के बारे में कहा गया था कि यह भारतीय संविधान की जन्मकुंडली हैं क्योंकि जिस प्रकार से जन्मकुंडली द्वारा ही किसी व्यक्ति का भविष्य बता दिया जाता है उसी प्रकार से इस प्रस्तावना को देखकर ही कोई भी व्यक्ति बता सकता है कि इस भारतीय संविधान में क्या लिखा गया है


3. पंडित जवाहरलाल नेहरू

पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा संविधान की प्रस्तावना को भारत के संविधान की आत्मा कहा गया है और उनके द्वारा यह कहा गया कि जिस प्रकार से किसी मानव के शरीर में आत्मा ना रहे तो वह किसी काम का नहीं उसी प्रकार से यदि भारत के संविधान में से प्रस्तावना हटा दी जाए तो फिर इसका कोई महत्व नहीं रह जाएगा


4. ठाकुरदास भार्गव

ठाकुरदास भार्गव द्वारा प्रस्तावना को भारतीय संविधान का हृदय बताया गया है


संविधान की प्रस्तावना में की गई संशोधन की मांगे

संविधान सभा के कुछ सदस्यों द्वारा अपने अपने मतानुसार इस प्रस्तावना में कई प्रकार के संशोधन की मांग की गई परंतु इनमें से कुछ मांगों को मान लिया गया और कुछ मांगों को नहीं भी माना गया

1. प्रस्तावना में पंथनिरपेक्षता और सैन्य शिक्षा को जोड़ने की मांग

संविधान सभा के सदस्य बृजेश्वर प्रसाद ने यह मांग की थी की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्षता और सैन्य शिक्षा तथा अनिवार्य, शिक्षा जैसे शब्दों को भी जोड़ा जाए


2. प्रस्तावना में महात्मा गांधी शब्द जोड़ने की मांग

संविधान सभा के सदस्य शिब्बन लाल सक्सेना ने प्रस्तावना में महात्मा गांधी शब्द को जोड़ने का अनुग्रह किया था क्योंकि वह महात्मा गांधी के विचारों से सर्वाधिक प्रभावित थे और उनके प्रमुख अनुयाई भी थे

परंतु उनके इस विचार को जे बी कृपलानी द्वारा नहीं माना गया और इसका विरोध भी किया गया


3. प्रस्तावना में ईश्वर शब्द जोड़ने की मांग

संविधान सभा के सदस्य हरि विष्णु कामत ने प्रस्तावना में ईश्वर शब्द को जोड़ने की मांग रखी थी परंतु इसे अस्वीकार कर दिया गया


4. प्रस्तावना में देवी शब्द जोड़ने की मांग

आसाम से संविधान सभा के सदस्य आर के चौधरी द्वारा यह प्रस्ताव रखा गया था की प्रस्तावना में देवी शब्द को जोड़ा जाए परंतु इसे भी अस्वीकार कर दिया गया


5 .प्रस्तावना में समाजवाद और संघात्मक शब्दों को जोड़ने की मांग

हसरत मोहानी द्वारा यह मांग की गई थी की प्रस्तावना में समाजवाद और संघात्मक शब्दों को भी जोड़ा जाए परंतु इसे भी संविधान सभा द्वारा अस्वीकार करते हुए हटा दिया गया था


FAQs : Bhartiya Samvidhan ki Prastavna in Hindi 

सवाल : संविधान की प्रस्तावना को संविधान सभा द्वारा कब स्वीकार किया गया था

संविधान सभा द्वारा 17 अक्टूबर 1949 को इसे स्वीकार किया गया था

सवाल : संविधान की प्रस्तावना को और अन्य किस नाम से जाना जाता है

संविधान की प्रस्तावना को उद्देश्य प्रस्ताव या उद्देशिका के नाम से भी जाना जाता है

सवाल : संविधान की प्रस्तावना में कितने प्रकार के न्याय वर्णित हैं

संविधान की प्रस्तावना में तीन प्रकार के न्याय वर्णित हैं, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक न्याय

सवाल : संविधान की प्रस्तावना में कितनी बार संशोधन किया गया

संविधान की प्रस्तावना में एक बार संशोधन किया गया जोकि 42 वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा किया गया था

सवाल : यह किसके द्वारा कहा गया था कि आज से प्रस्तावना भारतीय संविधान का एक भाग है

संविधान सभा में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद द्वारा यह कहा गया था कि आज से अर्थात कि 17 अक्टूबर 1949 से प्रस्तावना भारतीय संविधान का भाग है


Conclusion

आज के इस आर्टिकल में हम सब ने जाना कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना क्या है,  साथ में ये भी जाना कि भारतीय संविधान की Prastavna के कुछ महत्वपूर्ण शब्द और उनकी व्याख्या क्या है,

हम आशा करते है कि आपको आज के इस आर्टिकल से संपूर्ण जानकारी मिल चुकी होगी अगर आपको आज का ये आर्टिकलअच्छा लगा हो !

और अगर आपके कुछ सुझाव हो तो आप अपने सुझाव Comment box के  जरिए बताइए इस लेख को अपने दोस्तों को Share करके पूरी जानकारी उनके साथ भी साझा करे …. लेख को शुरवात से अंत तक पढ़ने के लिए धन्यवाद 

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