Sarkar ka kaun sa ang kanoon nirman karta hai

sarkar ka kaun sa ang kanoon nirman karta hai : आप सभी का स्वागत है हमारी वेबसाइट पर आज का विषय बहुत ही रोचक और जानकारी वाला होने वाला है और उस विषय का नाम है सरकार का कौन सा अंग कानून का निर्माण करता है

जैसा कि आप सभी जानते होंगे कि भारत एक संसदीय शासन प्रणाली वाला राष्ट्र हैं

जिसमें कि सरकार के अनेक अंग होते हैं और साथ ही यहां की सरकारें भी अनेक भागों में बंटी होती हैं जैसे कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय स्तर पर स्थानीय सरकार भी यहां पर बहुतायात में काम करती हैं।

sarkar ka kaun sa ang kanoon nirman karta hai इसको समझने से पहले हमें यह समझना होगा कि भारत में सरकार की कैसी प्रणाली काम करती हैं व सरकार के कौन-कौन से अंग होते हैं

और यह क्या क्या कार्य करते हैं। वर्तमान भारत में यदि संसद की बात की जाए तो इसके तीन अंग हैं जैसे की 

  1. राष्ट्रपति
  2. राज्यसभा
  3. लोकसभा

 

Sarkar ka kaun sa ang kanoon nirman karta hai
Sarkar ka kaun sa ang kanoon nirman karta hai

 

Sarkar ka kaun sa ang kanoon nirman karta hai

अगर बात की जाए भारत की तो भारत में कानून निर्माण का काम भारत की संसद द्वारा किया जाता है

जिसके की तीन अंग है लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति इन तीनों अंगों से मिलकर ही भारत की संसद का निर्माण होता है

और यदि भारत के लिए किसी कानून का निर्माण करना है तो इसी संसद द्वारा कानून का निर्माण किया जाता है।

आप जानते होंगे कि हम सभी मिलकर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस संसद के चुनाव में भाग लेते हैं | और संसद में हमारे प्रतिनिधियों को भेजते हैं और उन्हें हमारी भाषा में सांसद कहा जाता है

और यह हमारे क्षेत्र विशेष का प्रतिनिधित्व करते हैं और हमारी बात को संसद तक पहुंचाने का कार्य करते हैं और यह संसद में यह बताते हैं कि वास्तविकता में आम जनता को किस बात की जरूरत है।

किसी भी कानून के निर्माण से पहले किसी भी सांसद द्वारा उस का मसौदा तैयार किया जाता है

और संसद के समक्ष रखा जाता है जिसे की विधयक कहते हैं। इसके बाद इस विधेयक पर सदन में चर्चा की जाती हैं यह जरूरी नहीं है कि वह  किस सदन में रखा गया ।

अगर यह विधेयक एक सदन में पास हो जाए तो इसे दूसरे सदन में चर्चा के लिए भेजा जाता है,  दूसरा सदन चाहे तो इसे अस्वीकार भी कर सकता है

उदाहरण के तौर पर यदि विधेयक को राज्यसभा में रखा गया है तो उसे लोकसभा में चर्चा के लिए भेजा जाएगा और यदि विधेयक को लोकसभा में रखा गया है तो उसे चर्चा के लिए राज्यसभा में भेजा जाएगा।

इस प्रकार से दोनों सदनों से यह विधेयक पास हो कर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है

राष्ट्रपति चाहे तो इसे एक बार के लिए पुनर्विचार हेतु भेज सकता है परंतु दूसरी बार यदि राष्ट्रपति के समक्ष या विधायक आए तो इस पर हस्ताक्षर करना राष्ट्रपति का कर्तव्य माना जाता है अर्थात कि राष्ट्रपति इसे पुनर्विचार के लिए दोबारा नहीं भेज सकता है।

इससे यह सिद्ध होता है कि राष्ट्रपति केवल सोने के पिंजरे में बैठी हुई चिड़िया के समान हैं जो सोने का आनंद तो ले सकता है

लेकिन इसका इस्तेमाल नहीं कर सकता है क्योंकि हम सभी जानते हैं कि राष्ट्रपति को केवल नाम मात्र की शक्तियां भारतीय संविधान से प्राप्त हैं।

 

विधेयक का क्या अर्थ है

आप सोच रहे होंगे कि विधेयक क्या होता है तो विधेयक आमतौर पर कानून बनने से पहले कानून का कच्चा चिट्ठा होता है

जिसमें कि कानून में क्या होगा उसकी संपूर्ण जानकारी होती हैं जिससे कि किसी भी सांसद द्वारा जो कि उस विधेयक को सदन में रख रहा है प्रस्तुत की जाती हैं।

 किसी भी कानून को कानून बनने से पहले विधेयक ही कहा जाता है  इसे इंग्लिश में बिल कहा जाता है।

अगर किसी विधेयक को संसद के किसी सदन द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता है तो सांसद उस बिल को पुनः एक बार संसद के सदनों के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है

उदाहरण के लिए कई बार ऐसा देखा गया है कि यदि पहली बार में कोई विधेयक एक कानून नहीं बन पाता है तो उसे दूसरी बार फिर से सदन के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।

 

क्या किसी कानून को रद्द किया जा सकता है 

अगर आप सोच रहे हैं कि क्या किसी बने बनाए कानून को रद्द किया जा सकता है तो उसका उत्तर है हां,  किसी कानून को रद्द किया जा सकता है यदि वह कानून भारत के संविधान की प्रासंगिकता के आधार पर खरा नहीं पाया जाता है।

उदाहरण के लिए हाल ही में आपने देखा होगा कि भारत सरकार ने तीन कृषि कानूनों को वापस ले लिया जो कि किसानों के हित में नहीं थे इसके अलावा अनेकों बार ऐसा देखा गया है कि सरकार ने बने बनाए कानूनों को वापस ले लिया था।

लेकिन हर बार ऐसा नहीं किया जाता है कई बार कठोर विरोध के बावजूद भी कुछ कानूनों को वापस नहीं लिया जाता है

देखा जाए तो हाल ही में जो कानून नागरिकता के संशोधन के लिए लाए गए थे उनका कठोर विरोध होने के बावजूद भी उन्हें वापस नहीं लिया गया था।

 

भारत का कानून कौन बनाता है

यदि भारत की बात की जाए तो भारत में कानूनों को लागू करने का काम यहां के प्रशासनिक अधिकारियों का होता है जो कि केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों के रूप में कार्य करते हैं।

अगर किसी कानून को सफल रूप से लागू करना है तो उसकी संपूर्ण जिम्मेदारी प्रशासनिक अधिकारियों की होती हैं इन्हीं अधिकारियों द्वारा हर व्यक्ति तक इन कानूनों की जानकारी को पहुंचाया जाता है

और इसकी लाभ और हानियां उनको बताई जाती हैं जिससे कि वह इसका लाभ उठा सकें।

इन प्रशासनिक अधिकारियों का यह दायित्व रहता है कि वह कानूनों की जानकारी हर व्यक्ति तक पहुंचाएं जिससे कि यदि उसका कहीं पर शोषण हो रहा हो तो वह इसके खिलाफ अपनी आवाज को बुलंद कर अपनी आवाज उठा सकें।

संविधान संशोधन और कानून में क्या अंतर है 

मोटे तौर पर बात की जाए तो संविधान संशोधन और कानून में बहुत ही छोटा सा अंतर है लेकिन इसे समझना बेहद जरूरी है।

संविधान संशोधन भारत की संसद द्वारा किए जाते हैं ना कि किसी राज्य सरकार के विधान मंडल द्वारा इससे यह सिद्ध होता है कि विधानमंडल केवल कानून तक सीमित हैं

वह राज्य की किसी समस्या को लेकर कानून तो बना सकती हैं लेकिन संविधान में संशोधन नहीं कर सकती हैं

इससे यह सिद्ध होता है कि पूर्ण रूप से संविधान में किसी प्रकार की छेड़छाड़ करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार को प्राप्त हैं।

उदाहरण के तौर पर यदि किसी राज्य में बहुत ज्यादा अपराध बढ़ रहे हैं तो वह अपराधों को लेकर इससे संबंधित कानून बना सकती हैं,

हाल ही में राजस्थान की सरकार ने सरकारी परीक्षाओं में हो रही नकल को रोकने के लिए नकल विरोधी कानून बनाया है।

एक आदर्श कानून कैसा होना चाहिए 

किसी भी कानून को बनाते समय संसद के सदनों द्वारा या ध्यान रखा जाता है कि वह कानून समाज के सभी वर्गों तथा समाज के सभी व्यक्तियों तक समान रूप से पहुंचे और इसका लाभ हर एक व्यक्ति को मिले।

ऐसा ना हो कि संसद जो कानून बना रही हैं वह रक्षक बनने की बजाय समाज का भक्षक बन जाए।

और साथ ही कानून इतना मजबूत भी होना चाहिए कि वह अपराधियों को सजा दिला सके ना कि वह केवल कागजों में मजबूत होना चाहिए।

उदाहरण के तौर पर भारत में 1961 में दहेज प्रतिषेध अधिनियम बनाया गया था लेकिन आज उस अधिनियम की इस हिसाब से धज्जियां उड़ाई जा रही हैं

मानो कि वह कोई अपराध ही नहीं है आज भी खुले तौर पर भारत में दहेज लिया और दिया जाता है जबकि इस अधिनियम के तहत दहेज लेना और दहेज देना एक अपराध माना गया है।

 

कानून निर्माण की संपूर्ण प्रक्रिया 

जैसा कि हम जानते हैं सरकार के तीन अंग होते हैं व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका

इन तीनों के कार्य ही प्रथक प्रथक हैं इसे ही शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत कहा जाता है अर्थात कि यह एक दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगी एवं अपना अपना कार्य करती रहेंगी।

व्यवस्थापिका की बात की जाए तो या कानूनों के निर्माण का कार्य करती हैं और यदि बात की जाए कार्यपालिका की तो यह कानूनों के क्रियान्वयन की बात करती हैं

अर्थात कि उसे किस प्रकार से लागू किया जाए और वही बात की जाए न्यायपालिका की तो न्यायपालिका कानून की व्याख्या करने का कार्य करती हैं

अर्थात की क्या कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं यदि कानून संविधान के अनुरूप नहीं पाया जाता है तो न्यायपालिका उस संपूर्ण कानून को रद्द भी कर सकती हैं या अधिकार न्यायपालिका को संविधान से प्राप्त हैं।

 

क्या कभी न्यायपालिका ने किसी कानून को रद्द किया है 

हम चर्चा कर चुके हैं कि न्यायपालिका जो कि सरकार का एक अंग हैं वह किसी कानून को रद्द भी कर सकती हैं अगर वह कानून संविधान के पैरामीटर्स पर खरा नहीं उतरता है।

न्यायपालिका ने 2014 में 99 संविधान संशोधन को रद्द कर दिया था जो कि 1 जनवरी 2015 को लागू हुआ था

क्योंकि उस कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका को बढ़ा दिया गया था

इसको न्यायपालिका ने संविधान के अनुरूप नहीं माना क्योंकि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा था क्योंकि व्यवस्थापिका का न्यायपालिका में अत्यधिक जुड़ाव हो रहा था।

इसी तरह से सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 377 को भी हटा दिया था जो कि समलैंगिक आदि से संबंधित थी।

यदि सुप्रीम कोर्ट भारत की संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून को संविधान के आधार पर उसका अवलोकन करता हैं तो इसे न्यायिक पुनरावलोकन कहा जाता है जो कि सुप्रीम कोर्ट का सबसे शक्तिशाली हथियार माना जाता है।

 

संविधान के आधार पर कानून को क्यों जांचा जाता है 

आप सोच रहे होंगे कि यदि कोई कानून सही नहीं है या वह संविधान के अनुरूप नहीं है तो इसके लिए हर बार सविधान को ही क्यों आधार बनाया जाता है।

संविधान भारत की वह पहली पुस्तक हैं जिसके आधार पर पूरे देश को चलाया जा रहा है इसे पूरे भारत का आधार माना जा सकता है क्योंकि इसके बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती हैं

संविधान निर्माण के समय यह शक्ति न्यायपालिका को दी गई थी कि किसी असमंजस की स्थिति में वह संविधान की व्याख्या करेगा और किसी कानून की प्रासंगिकता क्या है

और यदि वह कानून सही नहीं है तो उसे किस आधार पर वह अनुचित ठहरा सकता है इसका निर्णय भी वह संविधान के आधार पर करेगा।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि सुप्रीम कोर्ट के अलावा भारत के किसी भी कोर्ट द्वारा संविधान की व्याख्या नहीं की जा सकती हैं ।

उदाहरण के तौर पर यदि किसी राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा किसी कानून पर कोई राय दी जाती हैं तो यह जरूरी नहीं है कि उच्चतम न्यायालय भी वही राय दें, अतः उच्चतम न्यायालय का निर्णय सर्वोपरि माना जाता है

और ऐसा माना जाता है कि उच्चतम न्यायालय ही केवल संविधान की संपूर्ण रूप से वाक्य करने में सक्षम हैं इस कारण से कानून की और भी महता बढ़ जाती हैं।

 

कानून की जरूरत क्यों 

भारत जैसे विशाल देश को चलाने के लिए एक बेहद ही शानदार व्यवस्था की आवश्यकता होती हैं। भारत में हर वर्ग जाति के लोग निवास करते हैं और उनकी आस्था भी अलग-अलग हैं।

कानून की आवश्यकता किसी अपराध को मात्र रोकने तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें जनता का हित भी छुपा हुआ होता है सरकार का यह उद्देश्य होता है

कि जिस कानून का निर्माण वह संसद के सदनों में बैठकर कर रहे हैं वह प्रत्येक जनमानस के हृदय तक जाना चाहिए अर्थात कि उससे हर व्यक्ति को फायदा पहुंचना चाहिए ना कि नुकसान।

अगर एक मजबूत देश का निर्माण करना है तो उसके लिए मजबूत कानून भी होने चाहिए जिससे कि वह सुगमता की राहों पर चल सके और विकास को प्राप्त कर सकें कई असामाजिक तत्वों की वजह से समाज में कई बार अशांति उत्पन्न हो जाती हैं

इन कानूनों द्वारा इन असामाजिक तत्व को जड़ से खत्म किया जा सकता है और समाज भर में खुशहाली लाई जा सकती हैं।

तो दोस्तों आज के इस पूरे लेख में हमने यह देखा कि कानून का निर्माण कौन करता है ,कानून का निर्माण कैसे होता है, और साथ ही कानून को भारत में लागू कैसे किया जाता है तो आज के लिए इतना ही मिलेंगे आपके साथ और आर्टिकल के साथ।


conclusion

आज के लेख में हम ने जाना “Sarkar ka kaun sa ang kanoon nirman karta hai” जिस में हम ने सरकार क्या है, सरकार के अंग, सरकार कितने प्रकार के होते है सिमित सरकार का कौनसा अंग कानून निर्माण करता है पर विस्तार में जानकारी साझा करने की कोशिश की है और उम्मीद करते है आप को हमारे द्वारा साझा किया यह लेख पसंत आया होगा |

यदि इस लेख संबंधित कोई भी सवाल आप के मन में होगा तो निचे कमेंट करना न भूले जिसका हम जरूर जवाब देंगे, इस लेख को शुरवात से अंत तक पढ़ने के लिए शुक्रिया

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