Karun Ras ki Paribhasha – करुण रस की परिभाषा और उदाहरण

karun ras ki paribhasha – करुण रस के बारे में और करुण रस किसे कहते हैं इसके बारे में जानने से पहले हम जानेंगे कि रस क्या है तो रस का शाब्दिक अर्थ होता है – आनन्द, काव्य में जो आनन्द आता है, वह ही काव्य का रस कहलाता है

काव्य में आने वाला आनन्द या रस लौकिक न होकर अलौकिक होता है रस को काव्य की आत्मा कहा जाता है संस्कृत में कहा गया है कि “रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्” अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य होता है

रस को अन्त:करण की वह शक्ति माना जाता है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं तथा मन कल्पना करता है, रस ही आनंद रूप है और यही आनंद विशाल का, विराट का अनुभव भी है तथा यही आनंद अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है

आदमी अपनी इन्द्रियों पर संयम करता है, तो विषयों से अपने आप हट जाता है परंतु उन विषयों के प्रति उसका लगाव नहीं छूटता, रस का प्रयोग सार तत्त्व के अर्थ में चरक तथा सुश्रुत में देखने को मिलता है दूसरे अर्थ में यह अवयव तत्त्व के रूप में मिलता है

सब कुछ नष्ट हो जाय, व्यर्थ हो जाय परन्तु जो भाव तथा वस्तु रूप में बचा रहे, वही रस है रस के रूप में जिसकी निष्पत्ति होती है

वह भाव ही होता है, परन्तु जब रस बन जाता है, तो भाव नहीं रहता केवल रस ही रहता है उसकी भावता अपना रूपांतरण कर लेती है रस अपूर्व की उत्पत्ति है नाट्य की प्रस्तुति में सब कुछ पहले से ही दिया रहता है, ज्ञात रहता है या फिर सुना या देखा हुआ होता है

इसके बावजूद हमें कुछ नया अनुभव प्राप्त होता है वह अनुभव दूसरे अनुभवों को पीछे छोड़ देता है तथा व्यक्ति को अकेले एक शिखर पर पहुँचा देता है रस का यह अपूर्व रूप अप्रमेय और अनिर्वचनीय होता है

आज हम पढेंगे karun ras ki paribhasha इसके अलावा हम इसके उदाहरणों और अवयव को भी आगे विस्तार से देखेंगे

 

karun ras ki paribhasha
karun ras in Hindi

 

Karun ras ki paribhasha – करुण रस की परिभाषा और उदाहरण

करुण शब्द का प्रयोग सहानुभूति एवं दया मिश्रित दुःख के भाव को प्रकट करने के लिये किया जाता है प्रिय व्यक्ति या मनचाही वस्तु के नष्ट हो जाने पर जब हृदय शोक से भर जाए, तब ‘करुण रस’ की निष्पत्ति होती है इसमें विभाव, अनुभाव व संचारी भावों के संयोग से स्थायी भाव शोक का संचार होता है

भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में प्रतिपादित आठ नाट्यरसों में शृंगार और हास्य के अनन्तर तथा रौद्र से पूर्व करुण रस की गणना की गई है ‘रौद्रात्तु करुणो रस:’ कहकर करुण रस की उत्पत्ति रौद्र रस से मानी गई है

यदि कोई आपसे karun ras ki paribhasha पूछे तो आप यह भी बता सकते हैं कि जब किसी मनचाही वस्तु के नष्ट होने पर हृदय शोक से भर जाए, तब ‘करुण रस उत्पन्न होता है

करुण शब्द सहानुभूति एवं दया मिश्रित दुख के भाव को प्रकट करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है अतः जब स्थाई भाव, अनुभाव एवं संचारी भाव के सहयोग से अभिव्यक्त होकर आस्वाद रूप धारण करता है तब इसकी परिणीति करुण रस कहलाती है करुण रस का स्थाई भाव शोक है

ये तो थी karun ras ki paribhasha इसके बाद अब हम देखेंगे करुण रस के कुछ उदाहरण


करुण रस के कुछ उदाहरण – Karuna ras ke kuch udaharan

उदाहरण 1

अभी तो मुकुट बँधा था माथ, कल ही हुए हल्दी के हाथ।
खुले भी न थे लाज के बोल, खिले थे चुम्बन शून्य कपोल I I
हाय रुक गया यहीं संसार! बना सिंदूर अनल अंगार।
वातहत लतिका यह सुकुमार, पड़ी है छिन्नाधार I I


उदाहरण 2

हा! वृद्धा के अतुल धन हा! वृद्धता के सहारे! हा!
प्राणों के परम प्रिय हा! एक मेरे दुलारे!


उदाहरण 3

सोक बिकल सब रोवहिं रानि, रूपु सीलु बलु तेजु बखानी
करहिं बिलाप अनेक प्रकारा, परहिं भूमितल बारहिं बारा॥


उदाहरण 4

जथा पंख बिनु खग अति दीना, मनि बिनु फ़न करिबर कर हीना
अस मम जीवन बन्धु बिन तोही, जौ जड़ दैव जियावै मोही॥


उदाहरण 5

तात तात हाँ तात पुकारी, परे भूमितल व्याकुल भारी I
चलन न देखन पायउँ तोही, तात न रामहिं सौंपेउ मोही॥


उदाहरण 6

राम-राम कहि राम कहि, राम-राम कहि राम।
तन परिहरि रघुपति विरह, राउ गयउ सुरधाम॥


उदाहरण 7 

मम अनुज पड़ा है चेतना हीन हो के, तरल हृदयवाली जानकी भी नहीं है।
अब बहु दुःख से अल्प बोला न जाता, क्षण भर रह जाता है न उद्विग्नता से II


उदाहरण 8

अर्ध राति गई कपि नहिं आवा, राम उठाइ अनुज उर लावा ॥
सकइ न दृखित देखि मोहि काऊ, बन्धु सदा तव मृदुल स्वभाऊ ॥
जो जनतेऊँ वन बन्धु विछोहु, पिता वचन मनतेऊँ नहिं ओहु॥


उदाहरण 9

तदनन्तर बैठी सभा उटज के आगे,
नीले वितान के तले दीप बहु जागे।


उदाहरण 10

हे आर्य, रहा क्या भरत-अभीप्सित अब भी?
मिल गया अकण्टक राज्य उसे जब, तब भी?


उदाहरण 11

हा ! इसी अयश के हेतु जनन था मेरा,
निज जननी ही के हाथ हनन था मेरा ।


उदाहरण 12

अब कौन अभीप्सित और आर्य, वह किसका?
संसार नष्ट है भ्रष्ट हुआ घर जिसका ।


उदाहरण 13

उसके आशय की थाह मिलेगी किसको?
जनकर जननी ही जान न पायी जिसको?


उदाहरण 14

यदि यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को।
चौंके सब सुनकर अटल केकयी स्वर को II


उदाहरण 15

विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली !


उदाहरण 16

टकटकी लगाये नयन सुरों के थे वे,
परिणामोत्सुक उन भयातुरों के थे वे।


उदाहरण 17

चिर सजग आँखे उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना I
जाग तुझको है दूर जाना II


उदाहरण 18

वह चन्द्रलोक था, कहाँ चाँदनी वैसी,
प्रभु बोले गिरा गँभीर नीरनिधि जैसी II


उदाहरण 19

उत्फुल्ल करौंदी-कुंज वायु रह-रहकर,
करती थी सबको पुलक-पूर्ण मह-महकर II


उदाहरण 20

मुझसे मैंने ही आज स्वयं मुँह फेरा,
हे आर्य, बता दो तुम्हीं अभीप्सित मेरा?


उदाहरण 21

हे भरतभद्र, अब कहो अभीप्सित अपना,
सब सजग हो गये, भंग हुआ ज्यों सपना।I


उदाहरण 22

मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,
चिन्ता का भार बनी अविरल I
रज-कण पर जल-कण हो बरसी
नव जीवन-अंकुर बन निकली II


उदाहरण 23

प्रभु ने भाई को पकड़ हृदय पर खींचा,
रोदन जल से सविनोद उन्हें फिर सींचा II


उदाहरण 24

पथ को न मलिन करता आना,
पद चिह्न न दे जाता जाना I
सुधि मेरे आगम की जग में,
सुख की सिहरन हो अन्त खिली II


उदाहरण 25 

शोक विकल सब रोवहि रानी,
रूपु सीलु बलू तेजु बखानी।I
करहि विलाप अनेक प्रकारा,
परिहि चूमि तल बारहि बारा।I


करुण रस के अवयव – Karuna ras ka avyav

karun ras ki paribhasha जानने के बाद अब हम देखेंगे करुण का अवयव कौन-कौन से हैं जो कि हमारे द्वारा नीचे दिए गए हैं

करुण रस का स्थायी भाव – शोक

संचारी भाव 

आश्रय के चित्त में उत्पन्न होने वाले अस्थिर मनोविकारों को संचारी भाव कहते हैं इनके द्वारा स्थायी भाव और भी तीव्र हो जाता है संचारी भावों की कुल संख्या 33 है जो कि हर्ष, विषाद, त्रास, लज्जा, ग्लानि, चिन्ता, शंका, असूया, अमर्ष, मोह, गर्व, उत्सुकता, उग्रता

चपलता, दीनता, जड़ता, आवेग, निर्वेद, धृति, मति, विबोध, वितर्क, श्रम, आलस्य, निद्रा, स्वप्न, स्मृति, मद, उन्माद, अवहित्था, अपस्मार, व्याधि, मरण हैं इसके अलावा करुण रस के कुछ संचारी भाव निम्न दिए गए हैं

  • ग्लानी
  • मरण
  • निर्वेद
  • स्नेह
  • स्मृति
  • उत्कर्ष
  • घृणा
  • उत्सुकता
  • चिंता
  • उन्माद
  • चिंता
  • आशा-निराशा
  • मोह
  • आवेग आदि

अनुभाव 

रति, हास, शोक आदि स्थायी भावों को प्रकाशित या व्यक्त करने वाली आश्रय की चेष्टाएं ही अनुभाव कहलाती हैं ये चेष्टाएं भाव-जागृति के उपरांत उत्पन्न होती हैं

इसलिए इन्हें अनुभाव कहते हैं, अर्थात जो भावों का अनुगमन करता है वह अनुभाव कहलाता है अनुभाव के दो भेद होते हैं – इच्छित और अनिच्छित, करुण रस के अनुभाव निम्न दिए गए हैं

  • छटपटाना
  • छाती पीटना
  • दुखी की सहायता करना
  • मूर्छा
  • रंग उड़ना
  • विलाप करना
  • चित्कार करना
  • आंसू बहाना
  • रोना आदि

उद्दीपन विभाव 

विषय द्वारा की गयी क्रियाएं और वह स्थान जो रस निष्पत्ति में सहायक होते हैं उन्हें उद्दीपन विभाव कहते हैं

  • मूर्छित शरीर
  • डाह क्रिया
  • रात का सुनसान समय

आलंबन विभाव 

जिन पात्रों के द्वारा रस की निष्पत्ति सम्भव होती है वें आलंबन विभाव कहलाते हैं आलंबन विभाव के दो भेद होते हैं आश्रय और विषय, आश्रय वे होते हैं जिसमे किसी के प्रति भाव जागृत होते हैं और जिसके प्रति भाव जागृत होते है वह विषय होता है

  • प्रिय वस्तु का नाश होना आदि
  • प्रिय व्यक्ति की मृत्यु

ये तो थे करुण रस के कुछ अवयव इसके अलावा करुण रस किसे कहते हैं इसके बारे में सम्पूर्ण जानकारी हमने आपको ऊपर प्रदान की है तो आईये अब रस के बारे में भी कुछ जानकारियां प्राप्त करें


रस क्या होता है – Ras kya hota hai 

रस शब्द की उत्पत्ति एवं अर्थ संस्कृत के ‘रस’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘रसस्यते असो इति रसाः से की गई है इसका अर्थ है जिसका आस्वादन किया जाए, वही रस है परन्तु साहित्य में रस उसे कहते हैं जिससे काव्य को पढ़ने, सुनने या उस पर आधारित अभिनय देखने से जो आनन्द प्राप्त होता है

सर्वप्रथम भरतमुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में रस के स्वरूप को स्पष्ट किया था रस की निष्पत्ति के सम्बन्ध में उनके द्वारा लिखा गया है

“विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः” इसका अर्थ है कि विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव के संयोग से ही रस की निष्पत्ति होती है इस प्रकार काव्य को पढ़ने, सुनने या अभिनय देखने पर विभाव आदि के संयोग से उत्पन्न होने वाले आनन्द को ही ‘रस’ की संज्ञा दी गयी है

काव्य में रस का वही स्थान है, जो मनुष्य के शरीर में आत्मा का होता है जिस प्रकार से आत्मा के अभाव में प्राणी का अस्तित्व सम्भव नहीं हो सकता है, उसी प्रकार रसहीन कथन को काव्य के रूप में नहीं स्वीकार किया जा सकता है इस प्रकार रस ही काव्य की आत्मा है


भरतमुनि की रस परिभाषा

भारत मुनि को ही रस उत्पत्ति को सबसे पहले परिभाषित करने का श्रेय जाता है उन्होंने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में रस के आठ प्रकारों का वर्णन किया है

रस की व्याख्या करते हुए भरतमुनि का कहना है कि रस सब नाट्य उपकरणों द्वारा प्रस्तुत एक भावमूलक कलात्मक अनुभूति है रस का केंद्र रंगमंच होता है भाव रस नहीं, अपितु उसका आधार है किंतु भरतमुनि ने स्थायी भाव को ही रस माना है


रस के प्रकार

आचार्य भरतमुनि ने नाटकीय महत्त्व को ध्यान में रखते हुए आठ रसों का उल्लेख किया है जो कि शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स एवं अद्भुत रस हैं

आचार्य मम्मट और पण्डितराज जगन्नाथ ने रसों की संख्या को नौ माना है श्रृंगार, हास, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शान्त रस

आचार्य विश्वनाथ ने वात्सल्य को दसवाँ रस माना है तथा रूपगोस्वामी ने ‘मधुर’ नामक ग्यारहवें रस की स्थापना की, जिसे आगे चलकर भक्ति रस के रूप में मान्यता मिली वस्तुत: रस की संख्या नौ ही है परन्तु हम आपको सभी 11 रसों के बारे में थोड़ी-थोड़ी जानकारियां नीचे देंगे


  1. श्रृंगार रस
  2. हास्य रस
  3. करुण रस
  4. वीर रस
  5. रौद्र रस
  6. भयानक रस
  7. बीभत्स रस
  8. अद्भुत रस
  9. शान्त रस
  10. वात्सल्य रस
  11. भक्ति रस

इन्हीं रसों में से एक है करुण रस, और जैसा कि हमने पढ़ा भी है karun ras ki paribhasha क्या है तथा इसके अवयव कौन-कौन से हैं तो करुण रस के बारे में जानकारियां प्राप्त करने के बाद आईये अन्य रसों के बारे में भी हम कुछ आवश्यक बातें जान लें

1) श्रृंगार रस

आचार्य भोजराज ने शृंगार रस को ‘रसराज’ कहा है शृंगार रस का मुख्य आधार स्त्री-पुरुष का पारस्परिक आकर्षण है, जिसे काव्यशास्त्र में रति स्थायी भाव कहते हैं

जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रति स्थायी भाव आस्वाद हो जाता है तो उसे श्रृंगार रस कहा जाता है शृंगार रस से हमें सुखद और दुःखद दोनों ही प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं इसी आधार पर इसके दो भेद बताये गए हैं जो कि संयोग शृंगार और वियोग श्रृंगार हैं

उदाहरण

चितवत चकित चहूँ दिसि सीता।
कहँ गए नृप किसोर मन चीता।।
लता ओर तब सखिन्ह लखाए।
श्यामल गौर किसोर सुहाए।।
थके नयन रघुपति छबि देखे।
पलकन्हि हूँ परिहरी निमेषे।।
अधिक सनेह देह भई भोरी।
सरद ससिहिं जनु चितव चकोरी।।
लोचन मग रामहिं उर आनी।
दीन्हें पलक कपाट सयानी।।

यहाँ सीता का राम के प्रति जो प्रेम भाव को दर्शाया गया है इसमें स्थायी भाव रति है


2) हास्य रस

विकृत या अजीब वेशभूषा, क्रियाकलाप, चेष्टा या वाणी देखकर और सुनकर मन में जो विनोद जन्य उल्लास उत्पन्न होता है, उसे ही हास्य रस कहते हैं हास्य रस का स्थायी भाव हास होता है

उदाहरण

जेहि दिसि बैठे नारद फूली।
सो दिसि तेहि न विलोकी भूली।।
पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं।
देखि दसा हरिगन मुसकाहीं।।

यहाँ स्थायी भाव हास दिखाई दे रहा है अत: यहाँ हास्य रस है


 3) वीर रस

युद्ध अथवा किसी कठिन कार्य को करने के लिए हृदय में निहित ‘उत्साह’ स्थायी भाव के जागृत होने के प्रभाव स्वरूप मन में जो भाव उत्पन्न होता है, उसे ही हम वीर रस कहते हैं

स्थायी भाव उत्साह जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों में मिलकर होकर आस्वाद हो जाता है, तब वीर रस की उत्पत्ति होती है

उदाहरण

मैं सत्य कहता हूँ सखे! सुकुमार मत जानो मुझे।
यमराज से भी युद्ध में प्रस्तुत सदा तुम जानो मुझे II
हे सारथे! हैं द्रोण क्या? आवें स्वयं देवेन्द्र भी।
वे भी न जीतेंगे समर में आज क्या मुझसे कभी II


4) रौद्र रस

रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध होता है विरोधी पक्ष द्वारा किसी व्यक्ति, देश, समाज या धर्म का अपमान या अपकार करने से उस व्यक्ति की प्रतिक्रिया में जो क्रोध उत्पन्न होता है, वह विभाव, अनुभाव और संचारी भावों में मिलकर आस्वाद हो जाता है और तब इस प्रकार से रौद्र रस उत्पन्न होता है

उदाहरण

“माखे लखन कुटिल भयीं भौंहें।
रद-पट फरकत नयन रिसौहैं।।
कह न सकत रघुबीर डर लगे वचन जनु बान।
नाइ राम-पद-कमल-जुग बोले गिरा प्रमान।।

यहाँ स्थायी भाव क्रोध दिख रहा है अत: यहाँ रौद्र रस है


5) भयानक रस

भयप्रद वस्तु या घटना देखने सुनने अथवा प्रबल शत्रु के विद्रोह आदि से ही भय का संचार होता है यही स्थायी भाव भय जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों में मिलकर जब आस्वाद हो जाता है तो वहाँ भयानक रस उत्पन्न होता है

उदाहरण

एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय।
विकल बटोही बीच ही, परयों मूरछा खाय।।

यहाँ पथिक के एक ओर अजगर और दूसरी तरफ सिंह है जिसकी वजह से वह भय के मारे मूर्छित हो गया है अत: यहाँ भयानक रस है


6) बीभत्स रस

वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा या घृणा है अनेक विद्वान् इसे सहृदय नहीं मानते हैं परन्तु फिर भी जीवन में जुगुप्सा या घृणा उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ तथा वस्तुएँ कम नहीं देखने को मिलती हैं

अत: घृणा का स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से मिलकर जब आस्वाद्य हो जाता है तब बीभत्स रस की उत्पत्ति होती है

उदाहरण

“सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनन्द उर धारत।।
गीध जाँघ को खोदि खोदि के मांस उपारत।
स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत।।”

यहाँ राजा हरिश्चन्द्र श्मशान घाट के दृश्य को देख रहे हैं इस समय उनके मन में उत्पन्न जुगुप्सा या घृणा स्थायी भाव है अत: यहाँ बीभत्स रस है


7) अद्भुत रस

किसी अद्भुत, अलौकिक तथा आश्चर्यजनक दृश्य या वस्तु को देख कर जब सहसा विश्वास नहीं होता तब मन में स्थायी भाव विस्मय उत्पन्न होता है और यही विस्मय जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों में मिलकर आस्वाद हो जाता है, तो अद्भुत रस उत्पन्न होता है

उदाहरण

“अम्बर में कुन्तल जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख,
सब जन्म मझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।”


8) शान्त रस

अभिनवगुप्त ने शान्त रस को सर्वश्रेष्ठ रस माना है संसार और जीवन की नश्वरता का बोध होने से चित्त में एक अलग प्रकार का विराग उत्पन्न हो जाता  है ऐसा होने पर मनुष्य भौतिक तथा लौकिक वस्तुओं के प्रति उदासीन हो जाता है

इसी को हम निर्वेद कहते हैं जो कि विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से मिलकर शान्त रस में परिणत हो जाता है

उदाहरण

सुत वनितादि जानि स्वार्थरत न करु नेह सबही ते।
अन्तहिं तोहि तजेंगे पर तू न तजै अबही ते।
अब नाथहिं अनुराग जाग जड़, त्यागु दुरदसा जीते।
बुझै न काम अगिनि तुलसी, कहुँ विषय भोग बहु घी ते।।

यहाँ स्थायी भाव निर्वेद मौजूद है अत: यहाँ शान्त रस है

शास्त्रीय दृष्टि से तो नौ ही रस माने गए हैं लेकिन कुछ विद्वानों ने सूर और तुलसी की रचनाओं के आधार पर दो नए रसों को भी मान्यता प्रदान की है जो कि वात्सल्य और भक्ति रस हैं तो आईये इन रसों के बारे में भी कुछ जानकारियां प्राप्त करें


9) वात्सल्य रस

वात्सल्य रस का सम्बन्ध छोटे बालक या बालिकाओं के प्रति माता-पिता और सगे-सम्बन्धियों का प्रेम तथा ममता के भाव से है हिन्दी कवियों में से सूरदास जी ने वात्सल्य रस को पूर्ण प्रतिष्ठा दी है वात्सल्य रस का स्थायी भाव वत्सलता या स्नेह है

उदाहरण

किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।
मनिमय कनक नन्द के आँगन बिम्ब पकरिबे धावत।
कबहुँ निरखि हरि आप छाँह को, कर सो पकरन चाहत।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ पुनि-पुनि तिहि अवगाहत।।

यहाँ स्थायी भाव वत्सलता या स्नेह, आलम्बन कृष्ण की बाल सुलभ चेष्टाएँ, उद्दीपन किलकना, बिम्ब को पकड़ना, अनुभाव रोमांचित होना, मुख चूमना, संचारी भाव हर्ष, गर्व, चपलता, उत्सुकता आदि देखने को मिल रहे हैं, अत: यहाँ वात्सल्य रस की उपस्थिति है


10) भक्ति रस

भक्ति रस शान्त रस से भिन्न है शान्त रस जहाँ निर्वेद तथा वैराग्य की ओर ले जाता है वहीं भक्ति ईश्वर से संबंधित रति की ओर ले जाता है यही इसका स्थायी भाव भी है

भक्ति रस के पाँच भेद देखने को मिलते हैं शान्त, प्रीति, प्रेम, वत्सल और मधुर ईश्वर के प्रति भक्ति भावना स्थायी रूप में मनुष्य के संस्कार में प्रतिष्ठित है, इस दृष्टि से भी भक्ति रस को मान्यता प्राप्त है

उदाहरण

मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।।
साधुन संग बैठि-बैठि लोक लाज सब खोई।
अब तो बात फैल गई जाने सब कोई।।

यहाँ स्थायी भाव ईश्वर विषयक रति, आलम्बन श्रीकृष्ण उद्दीपन कृष्ण लीलाएँ, सत्संग, अनुभाव-रोमांच, अश्रु, प्रलय, संचारी भाव हर्ष, गर्व, निर्वेद, औत्सुक्य आदि मौजूद हैं, अत: यहाँ पर भक्ति रस है


FAQ’s – karun ras ki paribhasha

सवाल : करुण रस का स्थायी भाव क्या होता है?

करुण रस का स्थाई भाव शोक होता है जहां किसी हानि के कारण शोक का भाव उपस्थित होता है वहां ‘करुण रस’ की उपस्थिति होती है

सवाल : करुण रस के देवता कौन हैं?

जहाँ तक कि करुण रस के देवता का प्रश्न है तो हिन्दी के अधिकतर कवियों ने ‘यम’ के स्थान पर ‘वरुण’ को अधिक मान्यता दी है 

सवाल : करुण रस किसे कहते हैं?
प्रिय व्यक्ति या मनचाही वस्तु के नष्ट हो जाने या उसका कोई अनिष्ट होने पर जब हृदय शोक से भर जाए तब ऐसी स्थिति में ‘करुण रस’ की निष्पत्ति होती है

सवाल : रस कितने प्रकार के होते हैं?

रस 11 प्रकार के होते हैं जिनके बारे में ऊपर हमने आपको विस्तार से बताया भी है इसके अलावा भरतमुनि के अनुसार रस 9 प्रकार के होते हैं

सवाल : करुणा रस का रंग कैसा होता है?

करुणा रस का रंग ग्रे होता है तथा इसकी भावना करुणा या उदासी होती है 


Conclusion 

आईये संक्षेप में देखते हैं कि आज हमने क्या-क्या पढ़ा, तो आज हमने पढ़ा कि karun ras ki paribhasha क्या है, इसके उदाहरण कौन-कौन से हैं तथा इसके अवयव के बारे में भी हमने विस्तार से पढ़ा

इसके अलावा हमने देखा कि करुण रस किसे कहते हैं, रस क्या होता है इसके प्रकार कितने हैं तथा इसके सभी प्रकारों के बारे में भी सारी जानकारियां हमने प्राप्त की

हम आशा करते हैं कि आपको हमारा आर्टिकल पसंद आया होगा तथा यदि आपको हमारे इस आर्टिकल से जुड़ी कोई भी समस्या है या फिर आपका कोई भी सुझाव है तो Comment box में हमें अवश्य बताएं

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